बिहार की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर देशभर में हंसी का पात्र बन गई है। पटना यूनिवर्सिटी में हालिया लॉटरी सिस्टम से हुई प्राचार्य नियुक्तियों ने ऐसा तमाशा खड़ा कर दिया है, जिसे सुनकर ना केवल शिक्षाविद हैरान हैं, बल्कि जनता भी पूछ रही है — क्या अब कॉलेज चलाने के लिए भी किस्मत की पर्ची निकालनी पड़ेगी
इस ‘नवाचार’ के तहत मगध महिला कॉलेज में एक पुरुष प्राचार्य की नियुक्ति कर दी गई। सोचिए, एक ऐसा संस्थान जो महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए जाना जाता है, वहां अब प्राचार्य की कुर्सी पर बैठेंगे श्रीमान वर्मा जी — जिन्हें महिला शिक्षा के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक पक्षों की समझ हो या ना हो, पर लॉटरी में उनका नाम जरूर निकल आया।
यही नहीं, गृह विज्ञान की विशेषज्ञ को विज्ञान कॉलेज भेजा गया, और रसायन विज्ञान के प्रोफेसर को कला संकाय का नेतृत्व दे दिया गया। नीतीश सरकार इस पर गर्व से कह रही है कि “अब कोई भाई-भतीजावाद नहीं होगा।” लेकिन क्या इस नए मॉडल में योग्यता और विषय विशेषज्ञता की कोई जगह है? लगता है राज्य सरकार अब शिक्षा मंत्रालय नहीं, ‘लॉटरी मंत्रालय’ खोलने की तैयारी में है।
राजभवन की देखरेख में हुई यह लॉटरी ‘पारदर्शिता’ के नाम पर की गई, लेकिन सवाल उठ रहा है — पारदर्शिता हो या पागलपन? शिक्षकों और छात्र संगठनों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यदि यह मॉडल कारगर है, तो अगली बार विधायकों, मंत्रियों और मुख्यमंत्री को भी लॉटरी से ही चुन लिया जाए।
इस निर्णय के बाद शिक्षा विशेषज्ञों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। एक प्रोफेसर ने तंज कसा, “अगर यही सिस्टम चलता रहा तो बिहार की यूनिवर्सिटीज़ में जल्द ही हम देखेंगे — भूगोल पढ़ाने वाले इतिहास के डीन होंगे और संगीत विभाग का संचालन कोई गणितज्ञ करेगा।” विपक्षी दलों ने भी नीतीश सरकार पर करारा हमला बोला और कहा कि यह व्यवस्था शिक्षा का नहीं, अशिक्षा का उत्सव है।
कुल मिलाकर, बिहार में शिक्षा अब योग्यता की नहीं, तुक्के की चीज बन चुकी है। पटना यूनिवर्सिटी की यह लॉटरी-लीला बताती है कि अब यहां डिग्री से ज़्यादा ड्रॉ की कीमत है। विद्यार्थी पढ़ाई करें या नहीं, लेकिन प्राचार्य बनने के लिए अब केवल भाग्यशाली होना ही काफी है।
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