“साला, ई रोड ही बवासीर है!” पंचायत फिल्म का यह संवाद पटना की सड़कों पर पूरी तरह लागू होता है। बिहार की राजधानी पटना, जहाँ बड़े-बड़े नेता और अभिनेता पैदा हुए, जहाँ शिक्षा और राजनीति की मजबूत धरोहर है—लेकिन यहाँ की सड़कों की हालत आज भी किसी गाँव के कच्चे रास्तों से बेहतर नहीं लगती। समय बदला, दुकानें शो-रूम में बदल गईं, कच्चे रास्तों की जगह पक्की सड़कें आईं, ट्रैफिक लाइट्स ने लाल-पीली हरियाली बिखेरी। मगर यह नज़ारा सिर्फ मेन रोड या कुछ चुनिंदा भीड़भाड़ वाले इलाकों तक सीमित है। जैसे ही आप कंकड़बाग या किसी गली में कदम रखते हैं, ऐसा लगता है मानो आप फिर से 20वीं सदी के पटना में पहुँच गए हों।
20वीं से 21वीं सदी तक का सफर
पुराने पटना की तस्वीर थी—कच्चे रास्ते, जलजमाव, घंटों का जाम। लेकिन 21वीं सदी में बदलाव की उम्मीद जगी। नितीश सरकार ने शहर में सबसे ज्यादा फ्लायओवर और डबल डेकर पुल बनाए। ऊपर की सड़कें मखमल जैसी चमकती हैं, लेकिन नीचे उतरते ही सड़कें गड्ढों का मैदान बन जाती हैं। ऐसा लगता है जैसे सड़कें जनता के हित में नहीं बल्कि केवल “दिखावे” के लिए बनाई गई हों।
अशोक राजपथ की सच्चाई
पटना का सबसे अहम इलाका है अशोक राजपथ। यहाँ बिहार का सबसे नामी पटना विश्वविद्यालय और राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल पीएमसीएच मौजूद है। इसके बावजूद यहाँ की सड़कें इतनी खराब हैं कि आए दिन ऑटो और ई-रिक्शा गड्ढों में फंसकर पलट जाते हैं। हाल ही में एक ई-रिक्शा इसी कारण पलट गया। पीएमसीएच के आसपास जलजमाव का आलम यह है कि एंबुलेंस तक को मरीन ड्राइव से घुमाकर ले जाना पड़ता है। जो लोग अशोक राजपथ से गुजरते हैं, उनके लिए यह सफर रोज का दर्द बन चुका है।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर असर
अशोक राजपथ और उसके आसपास के इलाके में ज्यादातर कॉलेज, कोचिंग संस्थान और अस्पताल स्थित हैं। यहाँ की सड़कों की बदहाली का सीधा असर छात्रों, मरीजों और आम लोगों पर पड़ता है। ट्रैफिक जाम, पानी भराव और गड्ढों की वजह से यह रास्ता लोगों के लिए चुनौती बन चुका है। पटना में विकास की तस्वीर फ्लायओवर और मरीन ड्राइव तक तो ठीक दिखती है, लेकिन गली-मोहल्लों और प्रमुख सड़कों की हकीकत अब भी “20वीं सदी का पटना” ही है। जब तक नीचे की सड़कों की मरम्मत नहीं होगी, तब तक विकास के दावे अधूरे और खोखले ही रहेंगे।
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