बिहार की राजनीति एक बार फिर अपने पुराने मोड़ पर लौट आई है। नीतीश कुमार एक बार फिर मुख्यमंत्री पद संभालने जा रहे हैं। यह घटना बिहार की राजनीतिक स्थिरता, नेतृत्व और विकास मॉडल को लेकर कई कड़े सवाल खड़े करती है। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन बार-बार की राजनीतिक पलटबाजी, गठबंधन बदलने की आदत और अधूरे वादे—इन सबने बिहार को विकास की दौड़ में लगातार पीछे धकेला है।
नेतृत्व की लगातार बदलती दिशा: जनता की थकान बढ़ी
नीतीश कुमार के नेतृत्व में पिछले एक दशक में बिहार ने जितनी बार राजनीतिक गठजोड़ बदले हैं, उतनी बार शायद ही किसी राज्य ने किया हो।
कभी महागठबंधन, कभी एनडीए, कभी अलग रास्ता… और फिर वापसी।
यह सिलसिला जनता के विश्वास को चोट पहुँचाता है। जनता पूछ रही है—
क्या मुख्यमंत्री की कुर्सी स्थिरता की जगह अस्थिरता का प्रतीक बन चुकी है?
विकास के वादे: कितने पूरे हुए, कितने अधूरे रह गए?
हर कार्यकाल में नीतीश कुमार विकास की बड़ी घोषणाएँ करते रहे हैं, परंतु जमीन पर हालात अब भी कड़वी सच्चाई बयां करते हैं:
- शिक्षा व्यवस्था लगातार संकट में
- विश्वविद्यालयों में सत्र नियमित नहीं
- बेरोजगारी चरम पर
- उद्योगों का वास्तविक विस्तार नहीं
- स्वास्थ्य ढांचा अभी भी कमजोर
सवाल यही है—अगर विकास मॉडल इतना प्रभावी था, तो बिहार आज भी पिछड़े राज्यों की सूची में क्यों बना हुआ है?
राजनीतिक नैतिकता बनाम सत्ता का गणित
नीतीश कुमार अक्सर “सुशासन” का दावा करते हैं, लेकिन गठबंधन बदलना उनके राजनीतिक सफर का स्थायी हिस्सा बन चुका है।
इससे यह धारणा मजबूत होती है कि—
सत्ता की गणित नैतिकता पर भारी पड़ जाती है।
जनता जानना चाहती है कि क्या यह स्थिर सरकार होगी या फिर कुछ सालों बाद नई राजनीतिक कहानी शुरू हो जाएगी?
युवाओं की उम्मीदें टूटीं, भविष्य अनिश्चित
बिहार के युवा आज सबसे ज्यादा निराश हैं।
नौकरी, परीक्षा, रिजल्ट, नियुक्ति—हर जगह अटकाव ही अटकाव।
एक बार फिर वही चेहरा सत्ता में लौटने से यह चिंता बढ़ गई है कि क्या अब भी बिहार युवाओं के लिए वही ठहराव वाला प्रदेश बना रहेगा?
क्या बिहार को नए नेतृत्व की जरूरत थी?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
लंबे समय तक एक ही नेतृत्व से राज्य में नीति-निर्माण का दृष्टिकोण सीमित हो जाता है।
बिहार को शायद एक नए विकल्प, नई सोच और नई ऊर्जा की जरूरत थी—जो वक्त के साथ बदलते बिहार की आकांक्षाओं को समझ सके।
सत्ता तो लौट आई, पर भरोसा?
नीतीश कुमार का फिर से मुख्यमंत्री बनना बिहार की उसी राजनीतिक कहानी का नया अध्याय है, जिसका कथानक वर्षों से बदलता नहीं—
वही गठबंधन, वही वादे, वही निराशा, वही उम्मीदें।
अब गेंद मुख्यमंत्री के पाले में है—
क्या वे इस बार बिहार को नए रास्ते पर ले जाएंगे?
या इतिहास खुद को दोहराएगा और जनता फिर से मायूस होगी?
समय इसका जवाब देगा।
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