वर्णमाला के अक्षर बिखरे पड़े है, कुर्सियां जमीन पर गिरी पड़ी है, डस्टर क्लास के कोने में कहीं गिरा पड़ा है, छात्रों के बैग के अन्दर लंच का डिब्बा खुला पड़ा है. यह मंजर है मयंमार के भूकंप के बाद के एक स्कूल का नजारा.म्यांमार के दूसरे सबसे बड़े शहर मांडले से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण में क्युकसे शहर में स्थित यह स्कूल, जहाँ पिछले हफ्ते शुक्रवार को मयन्मार में आये भीषण भूकंप की कहानी है.
मयन्मार में 7.7 की तीव्रता से भूकंप आया और पूरा शहर मानो धुल में मिल गया. जिस स्कूल की हम बात कर एर्हे है वहां लगभग 40 बच्चो की मरने की आशंका बताई जा रही है. लगभग 3000 स्थानीय लोगो के मारे जाने की आशंका है.
तीन दिन बाद अब घटनास्थल पर सन्नाटा पसरा है और लोग मेरे चेहरे पर दुख का भाव देख रहे हैं. सहायता समूह म्यांमार में और ज्यादा मानवीय संकट बढ़ने की चेतावनी दे रहे हैं. अस्पताल क्षतिग्रस्त है और उन पर बोझ बढ़ गया है. वहीं तबाही के बाद अभी तक पूरी स्थिति सामने नहीं आ पाई है. क्युकसे पहुंचने से पहले, हम राजधानी ने पी ताव में थे.
यहां हमने सबसे ज्यादा भयावह स्थिति देखी. यहां प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक ऐसी इमारत थी जिसका भूतल पूरी तरह से ढह गया था लेकिन उसके ऊपर तीन ऊपरी मंजिलें अभी भी खड़ी थीं. मलबे में खून के निशान और उनसे आ रही दुर्गंध यह बता रही थी कि वहां कई लोग मारे गए थे लेकिन बचाव कार्य को अंजाम देने के लिए कोई नहीं पहुंचा था.
पुलिस का एक समूह ट्रकों पर फ़र्नीचर और घरेलू सामान लाद रहा था, ऐसा लग रहा था कि वे बचे हुए लोगों की मदद करने के लिए जो कुछ भी इस्तेमाल करने लायक था उसे बचाने की कोशिश कर रहे थे. पुलिस अधिकारी ने हमें साक्षात्कार तो नहीं दिया लेकिन कुछ समय के लिए फ़िल्म बनाने की अनुमति दे दी. हम लोगों को रोते बिलखते देख सकते थे और उनकी हताश भी, लेकिन वे सैन्य सरकार से प्रतिशोध के डर से मीडिया से बात नहीं करना चाहते थे. हमारे पास बहुत सारे सवाल थे. मलबे के नीचे कितने लोग थे? क्या उनमें से कोई अभी भी जीवित हो सकता है? मृतकों के शवों को निकालने के लिए भी कोई बचाव कार्य क्यों नहीं किया गया?
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