कन्नड़ साहित्य और संस्कृति के एक प्रमुख स्तंभ, डॉ. एच. एस. वेंकटेश मूर्ति, जिन्हें उनके प्रशंसक और साहित्यिक जगत में ‘एचएसवी’ के नाम से जाना जाता है, का 30 मई 2025 को निधन हो गया। उनकी मृत्यु से कन्नड़ साहित्य जगत में एक अपूरणीय शून्य उत्पन्न हुआ है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
डॉ. वेंकटेश मूर्ति का जन्म 23 जून 1944 को कर्नाटक के दावणगेरे जिले के होदिगेरे गांव में हुआ था। उनके पिता नारायण भट्ट और माता नागरत्नम्मा थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा होलालकेरे और चित्रदुर्ग में प्राप्त की, और बाद में बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज से कन्नड़ में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने “कन्नड़दल्लि कथन काव्यगालु” विषय पर शोध कर साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।
शिक्षण और साहित्यिक योगदान
डॉ. मूर्ति ने बेंगलुरु के सेंट जोसेफ कॉलेज ऑफ कॉमर्स में तीन दशकों से अधिक समय तक अध्यापन किया। उनकी साहित्यिक यात्रा में उन्होंने 100 से अधिक कन्नड़ पुस्तकों की रचना की, जिनमें कविता संग्रह, नाटक, उपन्यास, बाल साहित्य, अनुवाद और आलोचनात्मक निबंध शामिल हैं। उनकी रचना “हूवी” को ICSE बोर्ड ने 9वीं और 10वीं कक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया था।
फिल्म और टेलीविजन में योगदान
डॉ. मूर्ति ने कन्नड़ सिनेमा में गीतकार, संवाद लेखक और पटकथा लेखक के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके उल्लेखनीय फिल्मी कार्यों में “चिन्नारी मुत्ता”, “कोट्रेशी कणसु”, “अमेरिका अमेरिका”, “क्रौर्य”, “मायत्री”, “किरिक पार्टी” और “सप्त सागरदाचे एलो साइड बी” शामिल हैं। इसके अलावा, उन्होंने टेलीविजन धारावाहिकों “मुक्ता” और “महापर्व” के शीर्षक गीत भी लिखे।
पुरस्कार और सम्मान
डॉ. मूर्ति को उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें शामिल हैं:
- बाल साहित्य पुरस्कार, केंद्रीय साहित्य अकादमी, 2013
- वी. एम. इनामदार स्मृति पुरस्कार उनके ग्रंथ “कुमारव्यस कथांतरा” के लिए
- फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार (कन्नड़) फिल्म “हसीरू रिबन” के लिए
- कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार (1977, 1985, 1986, 1993, 1997)
- कन्नड़ राज्योत्सव पुरस्कार, कर्नाटक सरकार, 2003
- देवराजा बहादुर पुरस्कार उनके उपन्यास “तापी” के लिए, 1978
- द्वनि श्रीरंगा अंतर्राष्ट्रीय कन्नड़ रंगमंच पुरस्कार, 2019
साहित्यिक दृष्टिकोण और विचार
डॉ. मूर्ति ने कन्नड़ साहित्य में प्री-नव्य और पोस्ट-नव्य आंदोलनों के बीच सेतु का कार्य किया। उन्होंने भावगीते शैली में कई लोकप्रिय गीत लिखे। उनकी कविताएं सरल भाषा में गहन भावनाओं को व्यक्त करती हैं, जिससे वे विभिन्न पीढ़ियों के पाठकों के बीच लोकप्रिय रहे। उन्होंने 85वें अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की, जो फरवरी 2020 में कलबुर्गी में आयोजित हुआ था। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने हिंदी को संपर्क भाषा बनाए जाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए संस्कृत या प्राकृत को संपर्क भाषा बनाने का सुझाव दिया था।
उनकी मृत्यु कन्नड़ साहित्य की एक बहुत बड़ी क्षति है.
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